Saturday, 10 April 2010

अम्बा थारौ आसरो

गढं जोधाण उपरे, बैठी पंख पसार ।
अम्बा थारौ आसरो, तूं हीज है रखवार ॥

चावण्ड थारी गोद में, खेल रह्‌यौ जोधाण ।
तूं हीज निंगे राखजे, थारा टाबर जाण ॥

तूं राणी ब्रम्हाण्ड री, जग री पालण हार ।
किण रै आगे जायनै, मांगू हाथ पसार ॥

तूं शक्ति तूं सरस्वती, तूं लक्ष्मी तूं माय ।
इक थारी किरपा होयां, रिध सिध सारा आय ॥

दे दे इसड़ौ दीद मद, होवै मन तिरपत ।
अटल लोय लागी रहे, चावण्ड चरणां नित ॥

ममतावां री डोर बट, बांध दई चरणाह ।
मृग तृष्णा रेवै नहिं, तरसै नहिं हिरणांह ॥

चुग चुग डोरा मोह रा, बटलूं डोर अजब्ब ।
चावण्ड चरणां बांध दूं, मांडू मौज गजब्ब ॥

करणी री किरपा तणी, आहीज बड़ी पिछाण ।
चित चरणां लागण चहै, सफळ जमारौ जाण ॥
रचित : महाराज प्रेमसिंघ

1 comment:

N D CHARAN said...

जोर री रचना है सा तरपत वैगा हे माँ.